Friday, 16 March 2012

आवारा हूँ , आवारा रहूँगा ...

गुलज़ार साब की ये नज़्म दिल को बहुत करीब से छूती है . आवारगी से कोई शिकवा शिकायत नहीं है इस में ... बल्कि अपने अकेलेपन का celebration है .
तो क्या हुआ कि ज़मीं हम को समझ पाई नहीं ,
कोई पहचानता है हम को उन खलाओं में ....
चाँद के पार कहीं ..
कोई दर्द नहीं है इस में ... बल्कि एक सुकून है .... आज़ादी का , बंदिशों के परे होने का . किसी परिंदे की तरह आकाश में उड़ने का ..

2 comments:

leena alag said...

me the lucky 1st follower!!!...hugeeeeee CONGRATS!!!...loved ur compositions...keeeeeeep writing so that i can keep reading...:)))

meeta said...

Thanks Leena ... and I count myself lucky to have a friend like you . Till you keep reading ... I'll keep writing :)

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