Friday, 18 May 2012

इन बूढ़े पहाड़ों पर .


"एक बार जब आप पहा़ड पर रह लेते हैं, उसके बाद आप पहा़ड से बच नहीं सकते। पहा़ड आपके खून में भर जाता है, आपके साथ-साथ रहता है। आप कहीं भी जायें।"
               - रस्किन बांड
                     

      मैं पूरी तरह से महसूस करती हूँ, पहाड़ों से बना हुआ ये अटूट रिश्ता. बचपन से लेकर अब तक अधिकाँश समय पहाड़ों में बिता पाने का जो मुझे सौभाग्य मिला है, उसने बहुत सी उन खूबसूरत भावनाओं को जिलाए रखा है,जो आपा धापी वाली शहरी ज़िन्दगी में लगभग नामुमकिन है. मेरा बचपन उत्तरकाशी जैसी सुन्दर और अद्भुत जगह में बीता. बचपन की उन यादों में भागीरथी आज की तरह बंधनों में बंधी नहीं है.
       मुक्त, कूल किनारे तोडती, बरसातों में उफनती गंगा नदी मुझे अच्छी तरह से याद है, और याद है पहाड़ों से बह कर आती हुई मिटटी से मटमैला हुआ वो पानी... जिसे देख कर मेरी सहेली मुझ से कहती
     " मीता तुझे पता है जब पानी का रंग ऐसा होता है तो गंगा माँ बलिदान मांगती हैं ."
और मैं सहम जाती. होता भी कुछ यों, कि बरसात में किसी ना किसी के पानी भरते या नदी पार करते समय बह जाने की खबर मिलती. और कुछेक दिनों बाद जब पानी वापस नीला हरा हो जाता, तो किसी अनुभवी बुजुर्ग की तरह मेरी सहेली फुसफुसाती - 
      " मैंने तुझ से कहा था न."

                                                 भागीरथी 
                                               चित्र - गूगल साभार
       तिलोथ के पुल पर स्कूल से घर लौटते, अक्सर मैं देर तक बहते पानी को देखती रहती ... लगता था जैसे पानी रुका हुआ है, और पुल और मैं कहीं बहे जा रहे हैं ... पता नहीं कहाँ!! वर्षों बाद जब उत्तरकाशी जाने का मौका दोबारा मिला, तो गंगा की सिमटी धारा और सूखे तट देख कर दिल बैठ सा गया.
       मुझे याद है तेखला का वो बहुत खूबसूरत मगर बेतरह अकेला मकान...जिसके सामने था एक ऊंचा पहाड़ और तलहटी में बहती थी भागीरथी.गंगोत्री जाते हुए रास्ते में तेखला आता है, सर्पीले मोड़ों से गुज़रते हुए वो पुराना सरकारी मकान अब भी दीखता है...हालाँकि SSB की बटालियन वहां से जा चुकी है...अब वहां कोई नहीं रहता. उस सामने वाले पहाड़ पर गर्मियों में आग लग जाया करती थी...सूखी पिरूंल की घास धू-धू कर जलती रहती और धीरे धीरे पूरा पहाड़ काला होता चला जाता.एक एक कर सारे पेड़ झुलसते जाते.मैं उन चिड़ियों के बारे में सोच कर सिहरती थी,जिनके बच्चे अभी उड़ना नहीं सीखे होंगे...पहाड़ों में अब भी आग लगती है और जंगलात विभाग के लिए एक बड़ा सरदर्द बनी रहती है .

                                              चित्र - गूगल साभार
बरसातों में फिर सब कुछ हरा भरा... पहाड़ के सारे ज़ख्म भर जाते और मैं भी भूल जाती कि कुछ दिनों पहले उसी जलते पहाड़ को देख कर मैं कितनी विचलित हुई थी...और तब...धुंआधार बारिशों के बाद जगह जगह रास्ते टूटते, हर साल जाने कितनी दुर्घटनाएं घटतीं...कभी कहीं बादल फटने की खबर आती...और कोई गाँव बह जाता...तो कभी किसी पुल के टूटने की. उफनती फुंफकारती गंगा को देख एक भयमिश्रित सौन्दर्यबोध होता था .

गढ़वाल के पहाड़ों में एक उदास गाम्भीर्य है...तपस्वियों सी विमुखता!! ऊंची चोटियाँ देख कर अपनी क्षणभंगुरता का आभास तो होता ही है, प्रकृति की भव्यता के समक्ष मन नतमस्तक भी हो जाताहै. पहाड़ में जितने सरल ह्रदय लोग मिलते हैं, उतना ही दुश्वार वे जीवन जीते हैं. कमर में दरांती खोंसे, सर पर खुद से बड़े घास के गट्ठे उठा कर ले जाती पहाड़ी स्त्रियों के मुस्कुराते चेहरों के पीछे है ... अद्भुत जिजीविषा ...

                         
         एक जादुई गीत जो कि गुलज़ार साहब का लिखा हुआ है , हमेशा मुझे वापस उन्हीं पहाड़ों पर खींच ले जाता है ...
                                                     - मीता.    

8 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत अच्छा लगा आलेख और गीत।


सादर

अनुपमा पाठक said...

अचल जो हैं पहाड़...
एक बार महसूस कर लिए गए, फिर स्मृतियों में... और जीवन में भी... उसी अचलता के साथ बस जाते हैं!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पहाड़ों का जीवन बहुत कठिन होता है पर हर जगह प्राकृतिक सौन्दर्य बिखरा होता है ... बहुत सुंदर पोस्ट ... प्रभावी लेखन

Meeta said...

बहुत धन्यवाद यशवंत आप का :-)

Meeta said...

सच कहा आपने अनुपमा .

Meeta said...

धन्यवाद संगीता जी ... आप हमेशा प्रोत्साहित करती हैं. आभार.

leena alag said...

Again a very beautiful visual etched by u meeta...iss sveltering heat mein pahaadon mein baithay honay ka ehsaas hota hai...nature sure cuts us to size n makes us realise that we are just tiny specks in this gigantic scenery created by God...:)

Meeta said...

This is how I've spend my childhood Leena....amidst mountains, in the rich lap of nature. Mountains are in my blood, and I miss them all the more, now that I am in Delhi... :)

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