Sunday, 27 May 2012

उदासी

Matthew Arnold की ये छोटी सी कविता मुझे बहुत पसंद है, शायद इसलिए, कि मन के भटकाव से मैं भी भली भांति परिचित हूँ. आते हैं, चले जाते हैं विचार... पल भर जगमगा कर मन के आकाश को... फिर कोई नया विचार, नयी रौशनी....

विचार 

जीवन के शांत, ठहरे सागर में
पड़ती हैं जिनकी अनबुझ परछाइयाँ,
लोग उन सितारों से परिचित हैं -
मेरे लिए जो कभी नहीं चमकते.

मेरी आत्मा के धुंधले क्षितिज पर 
कौंधते भर हैं विचार
और तुरत हो जाते हैं ओझल, 
न लौटने के लिए ... फिर कभी .
       
         अनुवाद - मीता.


Despondency.

The thoughts that rain their steady glow 
Like stars on life's cold sea,
Which other's know or say they know-
They never shone for me.

Thoughts light like gleams my spirit's sky
But they will not remain.
They light me once, they hurry by;
And never come again.

 - Matthew Arnold.   

6 comments:

sushma 'आहुति' said...

गहन अभिवयक्ति......

संजय कुमार चौरसिया said...

sundar abhivyakti

Meeta said...

धन्यवाद संजय जी.

Meeta said...

धन्यवाद सुषमा जी.

सदा said...

वाह ...बहुत ही बढिया।

Meeta said...

आभार.

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